Product Description
तथाकथित ज्योतिषियों के अनुसार जब राहु और केतु के बीच सभी ग्रह पाए जाते है तो कालसर्प योग का निर्माण होता है। जबकि वैदिक तथा वैज्ञानिक परिभाषा के अनुसार राहु ,केतु ग्रह नहीं होते अपितु सूर्य तथा चन्द्रमा के मार्ग के प्रतिच्छेदन से इनका निर्माण होता है। इसलिए इन्हे छाया ग्रह भी कहा जाता है। राहु तथा केतु सदैव एक दूसरे से 180 डिग्री पर होते है। अतः राहु (काल ) तथा केतु (सर्प ) के एकसाथ होने का कोई अर्थ ही नहीं। राहु व केतु प्रकाशहीन ग्रह है। अतः प्रकाशहीन ग्रहों के बीच प्रकाशवान ग्रहों की उपस्थिति का कोई अर्थ ही नहीं है। कागज़ में सिर्फ दो ही प्लेन होते है जिसके कारण राहु तथा केतु के बीच कभी- कभी सभी ग्रह इन दोनों छाया ग्रह के बीच दिखते है लेकिन वास्तविकता बिलकुल नहीं होती। भारतीय मनीषियों द्वारा रचित किसी भी शास्त्र में काल सर्प योग का कोई उल्लेख नहीं है। अर्थात कालसर्प योग वास्तव में मात्र एक पाखंड है वास्तविकता कुछ भी नहीं। कालसर्प योग वास्तव में वह योग है जो तथाकथित ज्योतिषीगण को बिना ज्योतिष के ज्ञान,अध्ययन, अध्यात्म के, आसानी से जनता को लूटने में समर्थ बनाता है।
Product Information
| Product Type | Books |
|---|---|
| Price (excl. tax) | ₹250.00 |
| Price (incl. tax) | ₹250.00 |
| Tax | ₹0.00 |
| Availability | In stock (10 available) |
| Tags | New Arrival, Trending |
| Author | Pandit Rajesh Tiwari |
| Pages | 200 |
| Number of reviews | 0 |